मैं इसलिए 2024 में मोदी को वोट नहीं दूँगा

आप को बचपन से सिखाया गया…

“बेटा, कमा कर खाओ, पुरुषार्थी बनो, दूसरों का मुंह मत ताको।”

और वही आप करते भी हैं: अपना काम मेहनत से करते हैं, समय पर टैक्स भरते हैं, बिजली चोरी नहीं करते, रेडलाइट जम्प नहीं करते…दूसरे शब्दों में आप एक ‘उत्तरदायी नागरिक’ हैं, पर आपको आज तक मिला क्या, बताइए ज़रा?

कुछ भी नहीं!

अब ज़रा मुझे देखिए:

जिस भी खाली सरकारी जगह पर मेरा दिल आ जाता है (‘सरकारी’ शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूँ ताकि आप सदा इसी भ्रम में जीते रहें कि “अरे ये तो सरकारी जगह है, कोई क़ब्ज़ा करता है तो करता रहे, मुझे क्या!?”) क्योंकि जिस दिन आपको ये समझ में आ गया कि वास्तव में ‘सरकारी ज़मीन’ सरकार की नहीं वरन पब्लिक की है, उस दिन से तो मेरी दाल ही गलनी बंद हो जाएगी ना।

तो क्या कह रहा था मैं?

हाँ…मैं कह रहा था कि मेरा जहाँ मन करता है, मैं वहाँ एक झुग्गी बना लेता हूँ। धीरे-धीरे उस झुग्गी को बड़ा करने लगता हूँ, कुछ दिनों पश्चात उस झुग्गी के आगे एक छोटी सी दुकान बना लेता हूँ, और बस, फिर क्या? फिर तो भूमि का वो टुकड़ा मेरे बाप का हो जाता है।

फिर जब कभी सरकारी कर्मचारी मुझे वहाँ से हटाने के लिए आते हैं तो उन्हें कुछ ‘देकर’ मैं उनका मुँह बंद कर देता हूँ। और जब कभी उन कर्मचारियों पर उपर से डंडा आता है तो आपको क्या लगता है मैं अकेला हूँ? अरे भाई साब, विपक्षी पार्टियों के नेता तुरंत आ जाते हैं मेरी सहायता के लिए (मोदी जी और अमितशाह को हराने के लिए तो वो किसी भी हद तक गिर, मेरा मतलब जा सकते हैं, है ना!?) और अकेले ही नहीं आते, अपने साथ मानवाधिकार का झंडा ऊँचा रखने वाले कुछ लोगों को भी ले आते हैं), फिर सब गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने लगते हैं, “देखो-देखो, ग़रीब आदमी के साथ कैसा अत्याचार किया जा रहा है, ये सरकार तो ग़रीब विरोधी है, बीजेपी हाय-हाय, मोदी इस्तीफ़ा दो।”

फिर तो सरकार को मुझे वहाँ से हटने के लिए ‘मनाना’ पड़ता है, वो भी एक बना बनाया घर देकर। 😉

उस मुफ़्त के घर में कुछ दिन आराम से रहने के बाद मैं वो घर किसी और को बेच देता हूँ, और फिर किसी सरकारी जगह पर झुग्गी बना लेता हूँ।

अब आप ही बताओ, जब मुझे बिना कोई टैक्स भरे, बिना किसी होम लोन की किस्त भरे ही बना-बनाया घर मिल जाता है तो मैं काम क्यूँ करूँ? पागल कुत्ते ने थोड़ी काटा है मुझे।

और एक आप हैं — बेचारा मध्यमवर्गीय प्राणी, दिन भर कोल्हू के बैल की तरह खटता रहता है। अपनी इच्छाओं को मार-मारकर, खून-पसीना एक करके जैसे-तैसे पैसे कमाता है। उस पैसे से सरकार को टैक्स भरता है ये सोचकर कि चलो उसका जीवन तो कट गया, जो बचा-खुचा है वो भी कट ही जायेगा पर कम से कम उसके बच्चों के लिए तो अच्छी सुविधाएं होंगी।

किंतु जब तक मेरे जैसे, ‘हरामखोरी धर्म’ का सच्चे मन से पालन करने वाले लोग भारत में हैं, तब तक मैं आपकी इन कुत्सित मनोकामनाओं की पूर्ति थोड़े ही होने दूंगा। भई, आप जैसे मूर्ख और आदर्शवादी लोग ही तो मेरा जीवन-आधार हैं, यदि आपकी अपेक्षाएं पूरी हो गयीं तो मेरा क्या होगा कालिया?

बच्चे पैदा करना मेरी ज़िम्मेदारी और उन्हें रोज़गार देना…मोदी जी की

अब देखिए भई, इस बात से तो आप भी इंकार नहीं करेंगे (और करेंगे भी तो मेरा क्या उखाड़ लेंगे) कि बच्चे तो ‘उपरवाले’ की देन हैं, और इसलिए मैं दबा के बच्चे पैदा करता हूँ।

औरों की छोड़िए, मेरे ख़ुद के दस बच्चे हैं… अगर मोदी जी उन दस के दस को रोज़गार नहीं दे सके तो वो तो फैल ही माने जाएँगे ना!

भई, उपरवाला तो बच्चे ही दे सकता है, रोज़गार थोड़े ही, और क्यूँ दे भला? ऊपरवाला कोई प्रधानमंत्री थोड़ी है, प्रधानमंत्री तो मोदी जी हैं ना, तो रोज़गार देना भी तो उनकी ही ज़िम्मेदारी है, है कि नहीं?

हाँ, बच्चे दस की जगह बारह करना, वो मेरी ज़िम्मेदारी है।

क्या मैं सांप्रदायिक हूँ?

कौन हूँ मैं? हिन्दू, मुसलमान, दलित, पिछड़ा, अगड़ा, वामपंथी, संघी….क्या?

अरे नहीं-नहीं सर,साम्प्रदायिकता से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मैं तो पूर्ण रूप से ‘सेक्युलर’ हूँ।

न तो मेरा कोई धर्म है और न ही जाति।

मैं हूँ पंथ-निरपेक्ष, धर्म-निरपेक्ष, और टैक्स-निरपेक्ष भी।

सत्य कहूँ तो मैं स्वयं को उस स्लैब में लेके जाता ही नहीं कि मुझे टैक्स भरना पड़े। मैं तो सदा–सर्वदा टैक्स-अयोग्य ही बना रहना चाहता हूँ क्योंकि उसी में मेरी भलाई है, उसी में तो मेरी हरामखोर प्रवृति की सुरक्षा है।

और काम? वो तो मैं बिलकुल नहीं करना चाहता, और क्यूँ करूँ, काम करने जैसा जघन्य कृत्य करें आपके जैसे आदर्शवादी लोग।

अब बताता हूँ कि मैं मोदी जी को वोट क्यों नहीं दूँगा २०२४ में

अधिक समय नहीं हुआ होगा जब मैंने एक मूर्ख, आदर्शवादी मोदी-भक्त को ये चेतावनी दी थी कि जब चुनाव होंगे न २०२४ में, तो मैं वो ग़लती नहीं दोहराऊंगा जो मैंने २०१४ और २०१९ में मोदी जी को वोट देकर की थी, और जब उस मोदी फैन ने मुझसे कारण पूछा तो मैंने कहा कि मैंने तो सोचा था मोदी जी अच्छा काम करेंगे, पर हुआ तो विपरीत ही, उन्होने अपना जो वास्तविक रूप दिखाना प्रारंभ किया था २०१४ में, वो तो २०१९ में भी उसी पर अडिग हैं।

“वो कैसे?” उस मोदी-भक्त ने पूछा।

अरे भाई, खान्ग्रेस के कुशासन काल में मैं अपने नैसर्गिक धर्म ‘हरामखोरी’ का निर्भय होकर पालन कर रहा था, फिर कुछ राष्ट्रवादी टाइप लोगों के बहकावे में आकर मैंने २०१४ में मोदी जी को वोट दे दिया। मोदी जी की वास्तविकता पता चलने पर मैं बहुत पछताया, पर सोचा कि चलो मोदी जी को २०१९ में भी एक अवसर दिया जाए, हो सकता है वो सुधर जाएँ, किंतु नहीं, वो तो जब से प्रधानमंत्री बने हैं, मेरी धर्म की अभिव्यक्ति पर एक के बाद एक कुठाराघात करते ही चले जा रहे हैं।

उन्होंने मुझ जैसे कामचोर को भी जो पिछले कई वर्षों से ‘कार्य ‘जैसी घृणित चीज़ से कोसों दूर था, कार्य पर लगा दिया (कलियुग, घोर कलियुग!)।

पहले मैं अपने कार्यालय में आराम से १२–१२:३० तक पहुंचा करता था और कई बार तो सप्ताहों तक कार्यालय जाता ही नहीं था (वैसे तो कार्यालय शब्द सुनते ही मुझे घिन आती है, उसमे ‘कार्य’ शब्द जुड़ा हुआ है न)। हर माह बिना कुछ किये-धरे ही मुझे नियत समय पर वेतन मिल जाता था, किन्तु जब से मोदी जी आये हैं, तब से मेरे तो ‘बुरे दिन’ आ गए हैं। अब तो चाहे हड्डी कँपा देने वाली ठंड हो या सिर चकराने देने वाली धूप, न चाहते हुए भी मुझे सवेरे साढ़े-नौ बजे ही एन्ट्री करनी पड़ती है और यदि कभी ९:३० से ऊपर हो गए तो समझो गया आधे दिन का वेतन पानी में (भैंस की आँख!)

मैंने तो नरेन्द्र मोदी जी को ये सोचकर वोट दिया था कि ये मुझे मेरे धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतन्त्रता देंगे। तब तो ये बड़ी सेकुलरिज्म, सेकुलरिज्म की बातें करते थे अपनी रैलियों में, और बस, उन्ही चिकनी-चुपड़ी बातों से मैं छला गया। किन्तु आप ये न समझे की मैं निराश हूँ, नहीं, निराश मैं कदापि नहीं हूँ। और आप ये भी न समझे कि मैं केवल इसी युग में हूँ।

मैं हर युग में विद्यमान रहा हूँ

आपको क्या लगता है, बरसों पहले जब मुसलमानों ने भारतवर्ष पर धावा बोला तो वो अकेले ही अपने अभियान में सफल हो गए थे? यदि आप ऐसा मानते हैं तो आप अँधेरे में जी रहे हैं। अरे वो मैं ही तो था जिसने उस समय उन हत्यारों, बलात्कारियों और लुटेरों की सहायता की थी। वो कहावत तो याद होगी न आपको, ‘घर का भेदी लंका ढाए?’ वो महान घर का भेदी मैं ही तो था।

मुसलमानों के बाद आये अँग्रेज़…

उन लोगों का साथ देना भी तो मेरा परम कर्तव्य था। तो मैंने अपने धर्म का पुनः पालन करते हुए उन का भी साथ दिया।

स्मरण रखिये कि भारतवर्ष को पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेजों का ग़ुलाम बनाने में मेरा सबसे बड़ा योगदान था। इन फ़ैक्ट, आपको तो कृतज्ञ होना चाहिए मेरा, कि अनगिनत बाधाओं के बाद भी मैंने अपने धर्म का पालन करना नहीं छोड़ा।

वैसे मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि देश का प्रधानमंत्री कौन है, अन्तर पड़ता है तो केवल इससे कि मैं अपने धर्म का पालन कर पा रहा हूँ अथवा नहीं।

मेरे मार्ग में चाहे जितने व्यवधान उपस्थित किये जाये, मैं केवल एक बात जानता हूँ कि हरामखोरी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा, और हाँ, २०२४ के लोकसभा चुनाव में मैं मोदी जी को वोट नहीं दूँगा।

और हिंदी में समझ में ना आया हो तो अंग्रेज़ी में भी सुन लो: I will not VOTE for MODI in 2024.

जय भारतवर्ष!

P.S.

इतना समझाने के बाद भी कुछ लोग ऐसे हैं जो मोदी को ही वोट देंगे, ये देखिए एक उदाहरण:

“भाई, मैं बताऊँगा मैं क्यूँ दूँगा मोदी जी कू वोट।”
“मैं रहण वाला हूँ पश्चिमी उत्तर परदेस के लक्ष्मीनगर का (जिसै कुछ लोग मुज़फ्फरनगर भी कह दै)”

भाई, पैन्तिस साल तै हमने कदि अपने गाम में फ्रिज की जमी ओड़ आइस करीम ना खा कै देखी, क्यूँ? लाइट ई ना आई कदि ढब सिर।”

“अर जब तै यो मोदी सरकार आई है यू पी मैं, तब सै सोला-सत्रा घंटे लाइट आउ जा, परकै हमने फ्रिज ले लिया गाम मैं, इस तै पहले तो सावरे चोर बैठे ते म्हारी छाति पै तो लाइट कहाँ ते आती!”

“न्यू दूँगा वोट मोदी कू!”

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